Monday, September 24, 2018
मुख्य समाचार मनोरंजन राष्ट्रीय राजनीति लाइफ स्टाइल स्वास्थ

‘शहरीकरण के पीछे, हम गाँवो को तो नही भूल गए’?

वो गाँव की पगडंडिया पर दौड़ना, खेत-खलिहान में फसलो के बीच खाट लगाकर सोना, बडे-बूढो के साथ बैठकर जीवन का ज्ञान लेना, शाम होते ही सबका साथ बैठकर खाना। कितने ही खूबसुरत और मनमोहक एहसास से परिपूर्ण होता है अपनी मिट्टी से जुड़ना।

कही न कही आज हमँ शहरीकरण के पीछे अमादा हो गए है कि अपनी ज़मीन, अपने वजूद से कोसो दूर होते जा रहे है। आज अगर आप दिल्ली, बम्बई या किसी बड़े शहर में रह रहे बच्चे से पूछे ‘कि गाँव कहाँ हुआ’?

तो वो उन शहरों को ही अपना गाँव करार कर देते है। आज हम ‘स्मार्ट सिटी‘ की बात करते है,लेकिन उससे ज़्यादा ज़रूरी है अपने ‘गाँवो को परिपक्व और स्मार्ट’ बनाने की।

भारत देश की पहचान, हमारा अस्तित्व, हमारे गाँवो की वजह से ही तो है। और विकास की दौड़ में इनका पीछे रहना अर्थात देश की प्रगति पर गतिरोध लगाना। ज़रूरी ये नही है कि शहरों की चका-चौंध को लाकर आप गाँव-वासियो को परोस दे। ऐसा करना शायद गाँव से उसकी अस्तित्व और उसकी पहचान को उससे छीनने समान है।

आवश्यकता है कि गाँवो तक पूर्णरूप से बिजली की सुविधा उपलब्ध करवाई जाए। फसलो को वर्षा-ऋतु का इंतेज़ार करने के बजाए प्रशाशन द्वारा पानी का प्रबल बंदोबस्त करवाया जाए। स्वछता और स्वास्थ्य को मद्देनजर रखते हुए हर घर मे शौचालयों का प्रबंध करवाया जाए। महिलाओं को कोयले के धुएं से अपने फेफड़े खराब करने से बेहतर गैस कनेक्शन दिलवाया जाए। अच्छी सड़के बनाई जाए,नौजवानों की शिक्षा के लिए बेहतर विद्यालयों और कॉलेजो का बंदोबस्त करवाया जाए,जिससे कि उन्हें शहरों की ओर रुख न करना पड़े। साथ-ही-साथ रोज़गार की ओर भी ध्यान दिया जाए।

अगर इन सब बातों पर हमारी सरकार, हमारा प्रशासन गंभीरतापूर्वक काम करे तो शायद ‘हमारे गाँव,शहरो को भी विकास के पैमानो में मात दे देंगे‘।

क्योंकि ऐसा न सोचा जाए कि ग्रामीण इलाकों के लोगो मे काबिलियता और प्रबलता की कमी है। बस ज़रूरत है थोड़ी दिशा और प्रशासनिक ईमानदारी की अगर इसे पाने में हम सक्षम हो गए तो ‘आने वाले समय मे हमारे गाँवो की मिसाले दी जाएंगी’।

The post ‘शहरीकरण के पीछे, हम गाँवो को तो नही भूल गए’? appeared first on SocialPost.