Sunday, May 20, 2018

यूपी उप चुनाव: योगी के लिए राह नही आसान

उत्तर प्रदेश उप चुनाव 2018:

उत्तर प्रदेश के गोरखपुर और फूलपुर सीट के लिए होने वाले लोकसभा उपचुनाव मे कुछ ही समय शेष है आज शाम तक चुनाव प्रसार भी थम जायेगा इन चुनावों पर देश भर की नजर लगी हुई है। एक सीट सूबे के मुख्यमंत्री की है और और दूसरी उपमुख्यमंत्री की। इनमें से खासकर फूलपुर की सीट का टकराव काफी अहम माना जा रहा है माना जा रहा है कि इसके नतीजे 2019 के राजनीतिक समीकरण तय करेगी इसलिये फूलपुर में बीजेपी ने रैलियों की झड़ी लगा दी है. पहली बार हासिल ये सीट वो खोना नहीं चाहती. जबकि बीएसपी ने यहां उम्मीदवार न उतार कर और सपा को समर्थन देने का एलान कर उसकी चुनौती कड़ी कर दी है।

फूलपुर एक ऐतिहासिक सीट रही है. यहां से नेहरू जीते, यहां से राम मनोहर लोहिया ने उनको चुनौती दी और हारे यहां से विजयलक्ष्मी पंडित जीतीं, यहां से कांशीराम चुनाव लड़े, यहीं से वीपी सिंह 1971 में जीते. छोटे लोहिया कहलाने वाले जनेश्वर मिश्र ने भी अपना परचम लहराया था. 2014 से पहले सपा लगातार चार बार ये सीट जीतती रही. लेकिन 2014 के मोदी लहर में केशव मौर्य ने यहां कमल खिलाया. पांच लाख से ज़्यादा वोटों से जीते । फूलपुर का महत्व इसलिए भी ख़ास है लेेकिन कांग्रस ने कहा है ंकि वह किसी के साथ गठबंधन नही करेगी।

अगर बीजेपी यहां हारती है तो इसके राजनीतिक मायने बड़े होंगे. पहला संदेश ये जाएगा कि हिंदी पट्टी में मोदी का जादू अपने चरम पर जा चुका है और अब उतार पर है. दूसरी बात कि बीएसपी-सपा गठबंधन 2019 में बीजेपी को मात दे सकती है और तीसरी बात कि फूलपुर गैर यादव ओबीसी के दबदबे वाला इलाका है, जहां बीजेपी की पैठ मानी जाती है. माना जाएगा कि बीजेपी का ये किला भी दरक रहा है.

23 साल पुरानी दुश्मनी के बाद साथ आए सपा-बसपा, माया-अखिलेश के सामने ये चुनौतियां

गोरखपु के चुनावों ने दो राजनीतिक प्रतिदव्ंदियों को भी साथ ला दिया है बात हो रही है माया व अखिलेश यादव की । राजनिति का भी अपना ही रंग है यंहा कब दोस्त दुशमन और दुशमन दोस्त बन जाये कुछ नही कह सकते। इस चुनावों में बीएसपी ये साफ कर चुकी है कि वो बीजेपी को हराने की रणनीति पर ही अमल करेगी।फूलपुर 19 लाख से ज्यादा वोटों की सीट है. इसमें 50 फ़ीसदी ओबीसी वोट हैं- सबसे ज़्यादा पटेल, दलित, मुस्लिम और अगड़े 15-15 फीसदी हैं । इनमें से कुछ वोट कांग्रेस भी काटेगी जो सपा-बसपा से अलग है। कांग्रेस को लगता है कि वह यह अपनी सीट कायम करेगी।

लेकिन बीजेपी को सबसे ज़्यादा फायदा अतीक अहमद की उम्मीदवारी से मिल सकता है. क्योंकि कांटे की इस लड़ाई में मुस्लिम वोट बंटे तो वह समीकरण बदलेगा जो सपा-बसपा बना रही है. दरअसल जा रहा है कि ये सिर्फ बाई पोल नहीं है बल्कि उत्तर प्रदेश के राजनीति की 2019 के राजनितिक समीकरण को तय करे गा इसलिए बीजेपी भी इसे पूरी गंभीरता से ले रही है हालांकि अलायंस की घोषणा से बीजेपी और अलर्र्ट है।

By: Alisha Sharma

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