Sunday, June 24, 2018

‘नारीत्व में प्रवेश’

‘ये महीनेे के उन दिनों की बात है’।

हमे ये कितना सुनने को मिलता है? शायद बहुत, तो आज जिस विषय पर हम चर्चा करने जा रहे है आप सब के चेहरे आड़े-तिरछे ज़रूर होंगे। ‘Menstruation’,जी हाँ आपने सही सुना।

(हिंदी में इसके कई और नाम भी है जैसे महावारी, प्रसव, मासिक धर्म आदि,लेकिन यहाँ हम पाठको की आसानी के लिए menstruation शब्द का ही इस्तेमाल करेंगे।)

बहुत ही आश्चर्यजनक बात है कि आज की दुनिया मे हम इसे बुरा और गंध मानते है। इसमें कोई छुपी हुई बात नही है कि इसे ‘औरतो का व्यापार‘(Womens’ own Bussiness) कहते है,और मर्दो को इसमें अपनी टांग नही अडानी चाहिए,जो कि अपने आप मे पितृसत्तात्मक सोच है। ये कोई बीमारी नही है अपितु एक साधारण जैविक प्रक्रिया है,जो कि पेशाब करने जैसा ही है।

तो आखिर क्यों हम menstruation को एक निषेद (taboo) मानते है?

लगभग हर धर्म मे इसे ‘अशुद्ध’ ही माना गया है,जो कि अपने आप मे सबसे बड़ा व्यंग है क्योंकि menstruation अपने आप मे एक ‘सफाई प्रक्रिया’ है। महिलाओं को ‘उन दिनों’ में पुजा करने या फिर किसी भी धार्मिक स्थल जाने की इजाज़त नही होती। इसाई धर्म जो कि ज़्यादातर पश्चिमी देशों ने अपनाया है उसमें भी इसे ‘संभावित रूप से पाप’ ही करार दिया गया है।

मर्द और औरत दोनो ही अभी तक इसे लेकर खुले नही है क्योंकि, मर्दों को इससे घिन आती है और वही औरतो को शर्म। हमे ये समझना होगा कि menstruation के बारे में सबसे असाधारण बात ही ये है,इसे एक ‘निषेद’ मानना और इससे जुड़ी पितृसत्तात्मक सोच। उदहारण के तौर पर, औरतों को menstruation के समय अचार नही छूने नही दिया जाता है,सच में!

मतलब की आप एक छोटी लडक़ी को बचपन से ये ट्रेन करते है कि इस साधारण सी चीज़ से भी वो शर्म और हया करे? क्या हमे इसे उत्साह के रूप में नही मनाना चाहिए कि एक बच्ची ‘नारीत्व‘ में प्रवेश कर रही है?

समय है सोच में बदलाव का और समाज मे इन चीज़ों को लेकर,सजक और जागरूक होने का,क्योंकि सेनेटरी नैपकिन्स को पेपर में लपेट कर फिर से उसे काले पॉलिथीन में बांधने की आवश्यकता नही है अपितु खुलकर इसके बारे में लोगो से चर्चा करने की ज़रूरत है।

तो आइये फिर अपनी औरतो को हम और नीचा न दिखाए, महज़ ये कहकर की आखिर ये तो ‘सभ्यता‘ है हमारी।

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