Sunday, December 16, 2018
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‘आओ ना खुले में शौच करते है!’

वो ठंडी-ठंडी बयार,लह-लहाते फूल,चिड़यो का कलरव और प्रकति का स्पर्श क्या सही मिश्रण होता है नही?

खुले में शौच करने का ये तो फायदा ज़रूर होता है एक की आप अपने वातावरण से सीधे संपर्क में आते है,बेशक कभी-कभी कुछ अतिक्रमियों (tresspassers) का सामना ज़रूर करना पड़ता है, परन्तु उसमे भी अपना अलग मज़ा है। मतलब,बचते-बचाते एक जगह से दूसरी जगह उठ कर जाना काफी रोमांचक और मजेदार ज्ञात होता है।

काफी हँसी आ रही होगी क्यों?

पर सच्चाई का सामना करके शायद थोड़ी शर्म का एहसास भी हो रहा होगा।

इसमें कोई गर्व की बात नही की देश का प्रधानमंत्री लाल किले की पटल से ‘खुले में हगने और मूतने के लिए मना करे’,मतलब क्या हम इतने भी समझदार नही की इतनी छोटी सी बात को समझने में मुश्किलात का सामना करना पड़ रहा है?

सरकार अपने तरफ से इस परेशानी से निज़ात पाने की सारी उक्त कवायदे अपना रही है,अब ये निर्भर करता है हमपर की इस मुहिम में उनका कितना और कैसा साथ देते है।

आज भारत मे ‘open defecation‘ यानी कि ‘खुले में शौच की’ महामारी कुछ इस प्रकार से फैली हुई कि ‘human development index‘ में हम निचले स्तर से ऊपर बढ़ ही नही पा रहे है। आलम ये है कि पाकिस्तान में कुछ समय पहले कुछ ‘trolls’ प्रचलित हुए कि ‘भई जिसके देश मे ढंग के शौचलय न हो,वो देश सर्जिकल स्ट्राइक क्या करेगा’?

ज़रूरत है ऐसे व्यवस्था की,की आगे आने वाली पीढियां हमपर शर्म न करे और सतत विकास का हम सही प्रायोजन कर सके। आज अगर हम इस मुहिम को देश भर में बेहतर तरीके से अपनाने में सफल हो जाते है।

तो गाँव मे रह रही महिलाओं को कोई भी कष्ट नही उठाना पड़ेगा, आज अगर हम स्वछ और दुरुस्त शौच का निर्माण करते है तो एक स्वस्थ भारत की नींव रखने में सफल होते है आदि।

तो आए और हाथ मिलाकर एक उज्ज्वल भविष्य की ओर बढ़े और प्रण ले कि शहर हो या गाँव, घर-घर शौचालयों का निर्माण करेंगे।

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