Sunday, December 16, 2018
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दहेज एक प्रथा या मज़बूरी?

‘शर्मा जी बहुत अच्छा आईएएस लड़का ढूंढा है,आपकी बिटिया के लिये’!
‘क्या बात कर रहे है,पर आईएएस है तो खर्चा भी ज़्यादा होगा क्यों’?

हमारे देश मे शादी किसी पर्व या त्यौहार से कम नही होती,अपितु खुशियों से ज़्यादा बोझ रहता है,भार रहता है खर्चे का। मतलब मेहमानों के आव-भगत,खान-पान आदि में जो खर्चा होता है सो अलग। और लड़के को ‘शगुन’ के तौर पर चेक या चार-पहिया वाहन देने की सिर-दर्दी अलग।

इसे प्रथा तो हम कदापि नहीं कह सकते है,लड़कीवालों की मजबूरी ज़रूर कह सकते है। ऐसा प्रतित होता है मानो की दो रिश्ते कोई पैसो के समझौते के जरिये तय हो रहा हो।यानी की आप मुँह-मांगी रकम दिजीए और रिश्ता पक्का।

आज के समय मे इसे ‘दहेज‘ के उलट एक सुगम और कानों को प्रिय लगने वाला शब्द दे दिया गया है ‘शगुन‘। जिसे की लड़कीवाले अपनी स्वेक्षा से ‘लड़के को नही अपनी लाडली को देते है, जिससे कि उसे दूसरे घर मे परेशानी न हो’। अब इस शगुन का ‘असल मालिकाना हकदार‘ कौन होता है नही होता है, इसका शायद हमें भली-भाती ज्ञात है।

क्या सदियों से चली आ रही इस कुप्रथा का आज के भारत मे कोई स्थान है? ये एक अहम सवाल है। चाहे लड़के के तरफ का,या फिर लड़की के तरफ का परिवार क्यों न हो,ज़रूरी है क्या किसी रिश्ते को पैसो के तर्ज पर जोड़ना?

क्या ज़रूरी है किसी लड़के का ‘बाज़ारी मोल‘ यानी कि ‘market price‘ तय करना? आज अगर कोई सामाजिक पटल पर खड़े होकर ‘दहेज कुप्रथा’ पर बात करता है तो अमूमन वो महज़ बातें ही रह जाती है।घर जाकर वो उसी कुप्रथा का भागीदार और हिस्सेदार बन जाता है।

आइये एक नई भारत की ओर हम कदम बढ़ाते है और सबसे पहले ये सुनिश्चित करते है कि ‘भई हम इस प्रथा को समर्थन नही देंगे’, इसके उपरांत समाज मे लोगो की जागरूकता बढ़ाते है। अगर हम बस इतनी छोटी सी प्रयास करने में सफल हो गए तो शायद कोई लड़की आत्मदाह नही करेंगी, ‘Divorce Rate‘ कम हो जाएंगे,किसी परिवार को शादी के लिए लोन लेना नही पड़ेगा आदि।

अंततः ‘बदलते भारत के साथ हमें अपनी सोच बदलने की भी सख्त आवश्यकता है‘। वो कहते है ना कि ‘सोच बदलकर देखो,अच्छा लगता है‘!

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