Sunday, December 16, 2018
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बाल मजदूरी के दंश में खोये बचपन की कुछ ऐसी मार्मिक तस्वीरें, जो कर देंगी आपको सोंचने पर मजबूर!

“बचपन की कश्ती, नन्हें से हाथ, सपने मेरे तेरी सौगात,
बारिश की बूंदों में कागज़ की नाव, ये है मेरा बचपन, बेशकीमती जज़्बात”

कुछ ऐसे ही जज़्बातों के साथ हम सभी का बचपन बीतता है, लेकिन आजादी के 70 साल बाद भी कइयों के बचपन ऐसे खुले जज़्बात लेकर आगे नहीं बढ़ पाते है. सपनों की दुनिया में किताबों की जगह मजदूरी का बोझ आ जाता है. खिलौनों के लिए जिद करने की जगह रोटी के लिए मेहनत करने की मजबूरी आ जाती है. सपनों का बचपन हथौड़े की थाप पर खो जाते हैं. बचपन की इसी मज़बूरी को दिखाते हुए आज हम आपको कुछ ऐसी तस्वीरें लेकर आए हैं, जिन्हें देखकर आज आपको खुद के आजाद होने पर शर्मिंदगी महसूस होगी. आप ये महसूस कर पाएंगे कि जैसा हमारा बचपन था उससे अलग इन बच्चों का बचपन है. आगे देखें बचपन की कुछ मार्मिक तस्वीरें-

1. “जिस पल तूने कलम से लिखना सिखा था, मैं अपनी तकदीर लिखने बैठ गया था”

2. “तेरे खिलौने तुझे खुशी देते होंगे, लेकिन मेरे खिलौने मुझे अक्सर चोट देते हैं”

3. “जिस बर्तन से तू अपने लिए देसी घी के लड्डू माँगा करता है, उस बर्तन को साफ़ करके मैं अपने लिए दो रोटी जमा करती हूँ”

4. “जब कभी देखता हूँ तुझे अपने पिता से पकवानों के लिए जिद करते हुए, सोचता हूँ… अच्छा है मेरी जिद सिर्फ दो रोटी के लिए है”

5. “जिस उम्र में तू आजाद पक्षी बनकर उड़ जाता है, उस उम्र में मैं लोहे की ज़ंजीरे बनाता हूँ”

6. “तूने शायद मिट्टी में खेलकर माँ की प्यार भरी डांट सुनी होगी, लेकिन अक्सर मैं इस ही मिट्टी में अपनी जिंदगी की लकीरों को तलाशती हूँ”

7. “स्कूल जाते समय तुझे स्कूल का बस्ता भारी लगता है, एक बार पलटकर ठहर और मेरे सपनों का बोझ देख”

8. “जिस मोटर गाड़ी में तू धूम-धाम से निकल जाता है, उसके टूटे कांच अक्सर मुझे मेरे सपनों से दिखने हैं”

9. “तू आगे चल मैं तेरी मीनारों की दो ईट उठाकर आता हूँ, तेरे सपनों के घरोंदे को मैं सजाता हूँ”

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